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एम्स,( AIIMS), ऋषिकेश के सोशल आउटरीच सेल (Social Outreach Cell) द्वारा संस्थान की कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर (डॉ.) मीनू सिंह के मार्गदर्शन में किए गए एक व्यापक क्रॉस-सेक्शनल सर्वेक्षण में यह स्पष्ट हुआ है कि युवाओं का स्वास्थ्य एवं कल्याण (wellness) एक बहुआयामी संरचना है, न कि कोई एकल मापदंड।

एम्स,( AIIMS), ऋषिकेश के सोशल आउटरीच सेल (Social Outreach Cell) द्वारा संस्थान की कार्यकारी निदेशक प्रोफेसर (डॉ.) मीनू सिंह के मार्गदर्शन में किए गए एक व्यापक क्रॉस-सेक्शनल सर्वेक्षण में यह स्पष्ट हुआ है कि युवाओं का स्वास्थ्य एवं कल्याण (wellness) एक बहुआयामी संरचना है, न कि कोई एकल मापदंड।

यह सात परस्पर जुड़े आयामों (शारीरिक, सामाजिक, आध्यात्मिक, कार्यस्थल/पर्यावरणीय, वित्तीय, बौद्धिक और भावनात्मक) में फैले भावनात्मक, वित्तीय और डिजिटल तनावों से गहराई से प्रभावित हो रहा है।

सर्वेक्षण् में सकारात्मक रूप से, कई संकेतक उत्साहजनक पाए गए, जिससे यह परिणाम सामने आए हैं, कि लगभग आधे प्रतिभागी नियमित व्यायाम करते हैं, जबकि लगभग दो-तिहाई पर्याप्त नींद लेने की बात कहते हैं।

युवाओं द्वारा शराब का सेवन केवल 8.6% और तंबाकू का उपयोग 5% से कम पाया गया, जो राष्ट्रीय औसत से काफी कम है। सर्वे के क्रम में तीन में से एक युवा ने बताया कि उनके पास कोई न कोई करीबी मित्र या विश्वासपात्र है, जिससे वह खुलकर बात कर सकते हैं।
अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता डॉ. संतोष कुमार और उनकी टीम ने अपने निष्कर्षों को वैश्विक वेलनेस फ्रेमवर्क—स्वारब्रिक के वेलनेस के आठ आयाम के संदर्भ में प्रस्तुत किया है।

वहीं उन्होंने कहा, “हमने अब तक युवा स्वास्थ्य को मानसिक समस्याओं, नशे या शारीरिक स्वास्थ्य के अलग-अलग मुद्दों के रूप में देखा है।

लेकिन यह डेटा बताता है कि, भावनात्मक तनाव को वित्तीय तनाव, डिजिटल लत, संस्थागत समर्थन और आध्यात्मिक अर्थ से अलग करके नहीं समझा जा सकता।

लिहाजा यह अलग-अलग अध्याय नहीं, बल्कि एक ही कहानी के हिस्से हैं।
डॉक्टर संतोष ने बताया कि, यह अध्ययन ऋषिकेश के विभिन्न शैक्षणिक संस्थानों में 15-26 वर्ष आयु वर्ग के 418 युवाओं पर किया गया। इसमें YUWA-JOSH प्रश्नावली के माध्यम से सात वेलनेस आयामों का आंकलन किया गया।

प्रमुख निष्कर्ष:
1. भावनात्मक स्वास्थ्य एवं शैक्षणिक दबाव: युवाओं में मानसिक दबाव एक गंभीर चिंता का विषय है। जिसमें 23.2% प्रतिभागियों ने बार-बार चिंता या घबराहट अनुभव करने की बात कही है। 10.8% शैक्षणिक अपेक्षाओं के बोझ से दबाव महसूस करते हैं। जहां 31.8% युवाओं ने आत्म-क्षति (self-harm) के विचार या व्यवहार की जानकारी दी, वहीं 4.3% ने आत्महत्या का प्रयास भी किया है।
इसके अलावा, 45.7% युवाओं ने परिवार या करीबी लोगों के साथ बार-बार गलतफहमियों की बात कही, जो भावनात्मक संतुलन की कमी को दर्शाता है। इस विश्लेषण से पता चला कि कम नींद, कम शारीरिक गतिविधियां, सामाजिक असहजता, शैक्षणिक दबाव और वित्तीय तनाव आदि आत्म-क्षति के विचारों को बढ़ाते हैं। जो युवा लगातार चिंता में रहते हैं, उनमें यह जोखिम लगभग पांच गुना अधिक पाया गया।
2. सामाजिक स्वास्थ्य: डाटा के मुताबिक 47.8% युवाओं को लगता है कि उनकी बातों और विचारों को महत्व नहीं दिया जाता, 32.5% सामाजिक समारोहों में असहज महसूस करते हैं । 12.2% युवाओं के पास कोई करीबी मित्र नहीं है, यह दर्शाता है कि सामाजिक उपस्थिति के बावजूद भावनात्मक समर्थन की कमी है।
3. वित्तीय प्रबंधन: सर्वे में शामिल किए गए युवाओं में 58.6% प्रतिभागी निम्न-आय वर्ग से थे, 28.3% युवाओं के भविष्य के निर्णय (जैसे कॅरियर/उच्च शिक्षा) वित्तीय तनाव से प्रभावित हुए। 34.7% प्रतिभागियों ने बताया कि आर्थिक सीमाओं ने उनके व्यक्तिगत लक्ष्यों को बाधित किया है ।
4. डिजिटल उपयोग एवं बौद्धिक स्वास्थ्य: 28.7% युवा प्रतिदिन 4 घंटे से अधिक गैर-शैक्षणिक स्क्रीन समय बिताते हैं, 51.9% ने माना कि डिजिटल तकनीक उनकी दिनचर्या और पढ़ाई में बाधा डालती है। यह डिजिटल संतुलन और मानसिक दृढ़ता (resilience) की आवश्यकता को दर्शाता है।
5. नेतृत्व एवं समग्र विकास: अध्ययन ने समाधान की दिशा भी दिखाई है : 61.2% युवाओं में जीवन का स्पष्ट उद्देश्य था।
80.1% में मजबूत आंतरिक विश्वास प्रणाली थी, 52.2% को सहयोगी वातावरण मिला, ऐसे युवाओं में आत्म-क्षति का जोखिम काफी कम पाया गया। हालांकि, केवल: 62% को पर्याप्त नींद मिलती है 50.5% नियमित व्यायाम करते हैं। केवल 19.6% पूरे दिन स्वयं को ऊर्जावान महसूस करते हैं, 41.6% को आध्यात्मिक गतिविधियों में अर्थ मिलता है जबकि 39.7% को कार्यस्थल/शैक्षणिक वातावरण से समर्थन मिलता है।

इंसेट

निष्कर्ष:
यह अध्ययन बताता है कि युवाओं की समस्याओं को अलग-अलग देखने की बजाए समग्र (holistic) दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, जिसमें शारीरिक गतिविधि, वित्तीय सशक्तिकरण और जिम्मेदार डिजिटल उपयोग शामिल हों। इसी संदर्भ में, 25 मार्च- 2026( बुधवार) को एम्स (AIIMS), Rishikesh में आयोजित होने वाला “नेशनल यूथ कॉन्क्लेव” अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह मंच विशेषज्ञों, शिक्षकों और युवाओं को एक साथ लाकर इन चुनौतियों पर गहन चर्चा करेगा। इसका उद्देश्य है:
• मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता बढ़ाना
• युवाओं से संबंधित संवाद को प्रोत्साहित करना
• युवाओं को तनाव प्रबंधन और आत्मविश्वास को व्यवहारिक कौशल देना।
यह पहल मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कलंक को तोड़ने और युवाओं को सशक्त बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
ऋषिकेश में इस राष्ट्रीय कार्यक्रम के आयोजन के साथ एक स्पष्ट संदेश सामने आता है—युवाओं का कल्याण अब नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

इस शांत शहर के पीछे एक ऐसी पीढ़ी है, जिसे समझ, सहयोग और समय पर हस्तक्षेप की आवश्यकता है। नेशनल यूथ कॉन्क्लेव इस परिवर्तन की शुरुआत साबित हो सकता है।

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